Sunday, February 20, 2011

समाजसेवा के नाम पर एनजीओ कर रहे स्वयंसेवा


समाजसेवा की राह में मेवा ही मेवा है। अनाथ, बेसहारा व निराश्रित महिलाओं की सेवा के नाम पर भी जाने कितनी स्वयंसेवी संस्थाएं लाखों रुपये डकार गईं। परदा हटने पर इन संस्थाओं का असली चेहरा सामने आया। फिलहाल इन्हें काली सूची में डालकर जांच कराई जा रही है। इनमें कई स्वयंसेवी संस्थाएं ऐसी हैं जो कई-कई विभागों से अनुदान लेकर स्वयं की सेवा में जुटी थीं। सेवा के नाम पर लाए गए पैसे की लूट-खसोट का ही नतीजा है कि महिला कल्याण विभाग ने कार्य न करने वाले सूबे के करीब 150 स्वयंसेवी संस्थाओं को काली सूची में डाल दिया है। आगरा मंडल के 11, झांसी के 4, लखनऊ के 37, बरेली के 6, मेरठ के 10, सहारनपुर के 5, मुरादाबाद के 17, वाराणसी के 3, मिर्जापुर के दो, गोरखपुर के 24, आजमगढ़ के दो, इलाहाबाद के 4, चित्रकूट का एक व देवीपाटन मंडल के 4 एनजीओ काली सूची में डाले गए हैं। महिला कल्याण निदेशक बिहारी स्वरूप का कहना है कि जो भी संगठन काली सूची में हैं, उन्हें महिला कल्याण की किसी योजना में काम करने नहीं दिया जाएगा। समाजसेवा का गोरखधंधा : जिन संगठनों को काली सूची में डाला गया है, उनमें अधिकांश ने उपभोग प्रमाण पत्र नहीं सौंपा है। केंद्र सरकार से पैसा लेने के बाद संबंधित मंत्रालयों को व्यय की रिपोर्ट नहीं दी। कई संस्थाओं ने ऋण नहीं चुकाया है। ध्यान रहे कि विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से दी गई सहायता राशि में एनजीओ की भागीदारी सुनिश्चित करने का निर्देश होता है। इस धन के लालच में ही समाजसेवा का गोरखधंधा शुरू होता है। लोग कागजों में काम दिखाकर पैसे हड़प लेते हैं। कपार्ट ने भी लगाए प्रतिबंध : केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की स्वायत्त इकाई कपार्ट (काउंसिल फॉर एडवांसमेंट ऑफ पीपल्स एक्शन एंड रूरल टेक्नालाजी) ने धन का दुरुपयोग करने वाले देश भर के करीब हजार एनजीओ को काली सूची में डाल कर कार्य करने पर प्रतिबंध लगाया है। नेता भी चला रहे एनजीओ : विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता रसूख का लाभ उठाकर एनजीओ चला रहे हैं। इनके एनजीओ विदेश से पैसा लाने में जुटे हैं। अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, जापान, नार्वे, स्वीडन, जर्मनी, रूस, कनाडा और आस्ट्रेलिया समेत कई देशों से बाल विकास, शिक्षा, बंधुआ मजदूरी, पर्यावरण, सफाई, धर्म, प्रचार, बालश्रम उन्मूलन, बीज, सुलभ शौचालय, दहेज उन्मूलन व अंधविश्वास तोड़ने जैसे विभिन्न कार्यो के लिए धनराशि मिल रही है। ऐसा नहीं है कि सभी एनजीओ लूट-खसोट में ही लगे हैं। कुछ काम करने वाले भी हैं, जिनकी ख्याति दूर दूर तक फैली है, लेकिन 80 फीसदी से अधिक संगठन गोरखधंधे में ही शामिल हैं।



Thursday, February 3, 2011

एनजीओ की विश्वसनीयता


माना गया है कि देश में छोटी-बड़ी तीन करोड़ तीस लाख पंजीकृत गैर-सरकारी संस्थाओं के पास प्रतिवर्ष आठ से सोलह बिलियन अमेरिकी डॉलर की रकम आती है। लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इस क्षेत्र में काम कर रहे एक वर्ग का रुझान धन की तरफ अधिक है और इनका सेवाभाव पीछे छूट गया है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2005-06 और 2006-07 के वित्तीय वर्ष में एनजीओ के लिए विदेशी धन की आमद में 56 फीसद की वृद्धि हुई। 2008 के आंकड़े बताते हैं कि गैर-सरकारी संस्थाओं के लिए इस वर्ष 2.15 बिलियन अमेरिकी डॉलर आया। देश में गैर सरकारी संस्थाओं के कामकाज पर नजर रखने वाले जानकारों की मानें तो संस्थाओं को मिलने वाले धन का लगभग पचास फीसद हिस्सा सही जगह पर खर्च नहीं होता है। विदेश में रहने वाले लोगों से किसी गरीब बच्चे की मदद या इसी प्रकार की किसी दूसरी जरूरत की मद में पैसे मांगे जाते हैं। विदेश में बैठे व्यक्ति को लगता है कि उसके पैसे से किसी बच्चे या समाज का भला हो रहा है लेकिन ऐसी गैर सरकारी संस्थाओं की कमी नहीं है, जो अपनी आमदनी-खर्च का खुलासा नहीं करते। जबकि गैर सरकारी संस्थाओं के लिए अनिवार्य होना चाहिए कि वे अपनी आमदनी और खर्च का ब्योरा सार्वजनिक करें। शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण जैसे तमाम विषयों पर काम करने वाली संस्थाओं का उद्देश्य होता है, इन व्यवस्थाओं में सुधार। यदि एक संस्था चाहती है कि कोई सरकारी विभाग अपने काम काज में पारदर्शिता लाए तो यह भी जरूरी है कि वह पहले अपने कामकाज में वही पारदर्शिता दिखलाए। आज ऐसे गैर-सरकारी स्वयंसेवी संस्थाओं की कोई कमी नहीं है, जो पैसा उगाहने की दुकान की तरह काम कर रहे हैं। उनकी पूरी ताकत इस बात में लगती है कि किस तरह अधिक से अधिक पैसा वे अपनी संस्था के लिए जुटा सकते हैं। इस बात की तरफ वे कम ही ध्यान दे पाते हैं कि उनकी संस्था का अकाउंट भी दुरुस्त होना चाहिए। यही कारण है कि भारत में अधिकांश गैर- सरकारी संस्थाओं की विश्वसनीयता संकट में है। गैर- सरकारी संस्थाओं की बड़ी भूमिका काले धन को सफेद करने में भी देखी जा रही है। ऐसे ही एक मामले में हाल में ही मानवाधिकारवादी एनजीओ एक्टिविस्ट और साउथ एशिया ह्यूमेन राईट्स डॉक्यूमेन्टेशन सेन्टर के कार्यकारी निदेशक यूरोपियन एन्टी फ्रॉड एजेन्सी के जांच दायरे में थे। भारत में 2000 के बाद गैर सरकारी संस्थाओं के पंजीयन में गजब की तेजी देखी गई है। कुल संस्थाओं में पैंतालिस फीसद से भी अधिक संस्थाएं वर्ष 2000 के बाद ही पंजीकृत हुई हैं। देश में सभी संस्थाओं के लिए कोई एक प्रकार की नीति नहीं है। भारत में सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860, द इंडियन ट्रस्ट एक्ट 1882, सेक्शन 25 ऑफ द कंपनीज एक्ट 1961 और द बॉम्बे पब्लिक चेरिटेबल ट्रस्ट एक्ट 1950 के अन्तर्गत पंजीकृत, बिना किसी लाभ के चलने वाली कोई भी संस्था एनजीओ है। यही नहीं, एनजीओ द्वारा दायर आयकर के वार्षिक रिटर्न को सार्वजनिक करने की कोई बाध्यता उस पर नहीं है। यदि हम देश भर के एनजीओ की कार्यपण्राली में सुधार लाना चाहते हैं तो इसके नियम एकीकृत करने की जरूरत है। इतना ही नहीं, सभी एनजीओ का पंजीकरण किसी एक कायदे के अन्तर्गत हो और उसके लिए अपने आय-व्यय को सार्वजनिक करना अनिवार्य बने। इससे समाज में एनजीओ जिस विवाद के संकट से इस दौरान गुजर रहा है, उससे बाहर निकलने में उसे मदद मिलेगी।