समाजसेवा की राह में मेवा ही मेवा है। अनाथ, बेसहारा व निराश्रित महिलाओं की सेवा के नाम पर भी जाने कितनी स्वयंसेवी संस्थाएं लाखों रुपये डकार गईं। परदा हटने पर इन संस्थाओं का असली चेहरा सामने आया। फिलहाल इन्हें काली सूची में डालकर जांच कराई जा रही है। इनमें कई स्वयंसेवी संस्थाएं ऐसी हैं जो कई-कई विभागों से अनुदान लेकर स्वयं की सेवा में जुटी थीं। सेवा के नाम पर लाए गए पैसे की लूट-खसोट का ही नतीजा है कि महिला कल्याण विभाग ने कार्य न करने वाले सूबे के करीब 150 स्वयंसेवी संस्थाओं को काली सूची में डाल दिया है। आगरा मंडल के 11, झांसी के 4, लखनऊ के 37, बरेली के 6, मेरठ के 10, सहारनपुर के 5, मुरादाबाद के 17, वाराणसी के 3, मिर्जापुर के दो, गोरखपुर के 24, आजमगढ़ के दो, इलाहाबाद के 4, चित्रकूट का एक व देवीपाटन मंडल के 4 एनजीओ काली सूची में डाले गए हैं। महिला कल्याण निदेशक बिहारी स्वरूप का कहना है कि जो भी संगठन काली सूची में हैं, उन्हें महिला कल्याण की किसी योजना में काम करने नहीं दिया जाएगा। समाजसेवा का गोरखधंधा : जिन संगठनों को काली सूची में डाला गया है, उनमें अधिकांश ने उपभोग प्रमाण पत्र नहीं सौंपा है। केंद्र सरकार से पैसा लेने के बाद संबंधित मंत्रालयों को व्यय की रिपोर्ट नहीं दी। कई संस्थाओं ने ऋण नहीं चुकाया है। ध्यान रहे कि विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से दी गई सहायता राशि में एनजीओ की भागीदारी सुनिश्चित करने का निर्देश होता है। इस धन के लालच में ही समाजसेवा का गोरखधंधा शुरू होता है। लोग कागजों में काम दिखाकर पैसे हड़प लेते हैं। कपार्ट ने भी लगाए प्रतिबंध : केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की स्वायत्त इकाई कपार्ट (काउंसिल फॉर एडवांसमेंट ऑफ पीपल्स एक्शन एंड रूरल टेक्नालाजी) ने धन का दुरुपयोग करने वाले देश भर के करीब हजार एनजीओ को काली सूची में डाल कर कार्य करने पर प्रतिबंध लगाया है। नेता भी चला रहे एनजीओ : विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता रसूख का लाभ उठाकर एनजीओ चला रहे हैं। इनके एनजीओ विदेश से पैसा लाने में जुटे हैं। अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, जापान, नार्वे, स्वीडन, जर्मनी, रूस, कनाडा और आस्ट्रेलिया समेत कई देशों से बाल विकास, शिक्षा, बंधुआ मजदूरी, पर्यावरण, सफाई, धर्म, प्रचार, बालश्रम उन्मूलन, बीज, सुलभ शौचालय, दहेज उन्मूलन व अंधविश्वास तोड़ने जैसे विभिन्न कार्यो के लिए धनराशि मिल रही है। ऐसा नहीं है कि सभी एनजीओ लूट-खसोट में ही लगे हैं। कुछ काम करने वाले भी हैं, जिनकी ख्याति दूर दूर तक फैली है, लेकिन 80 फीसदी से अधिक संगठन गोरखधंधे में ही शामिल हैं।
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